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Saluting 3D Models

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Anonymous1771502330
Anonymous1764326996
Anonymous1757522888
Anonymous1762656338
Anonymous1770736364
Anonymous1762309425
a charismatic Moroccan officer in crisp navy attire, medals gleaming with pride, adjusting his golden-trimmed cap while greeting visitors with a distinguished bow
Anonymous1770662382
Anonymous1747710186
Border ke paas ek chhota sa gaon tha.
Ek din ghalti se ek Indian soldier ka beta border paar kar gaya aur Pakistan side aa gaya.
Pakistani soldier ne us bachche ko dekha aur bola:
“Tum ghalat side aa gaye ho.”
Bachcha darr ke bola:
“Mujhe ghar jana hai…”
Soldier ne use pani pilaya, biscuit diya aur radio se message bheja.
Thori dair baad Indian soldiers aaye.
Indian captain bola:
“Shukriya… aapne hamare bachche ko nuksaan nahi pohanchaya.”
Dono soldiers ne ek dusre ko salute kiya.
Border phir se band ho gaya, lekin dono ko samajh aa gaya:
Dushmani hukm ki hoti hai, dil ki nahi.
Anonymous1769678995
un cadete de la fuerza area ecuatoriana estando firmes con el uniforme gran parada en la cabeza puesta la cristina por favor
Anonymous1770247905
Anonymous1737573439
Anonymous1770069549
Anonymous1769389954
Anonymous1769389954
ठीक है 😊
ये एक रिपब्लिक डे की कहानी है—जो स्कॉच के ग्लास से लेकर ढाई-सौ के नोट तक, हर किसी को छूती है।
26 जनवरी की सुबह थी।
दिल्ली की ठंड में सूरज धीरे-धीरे उठ रहा था।
लुटियंस ज़ोन के एक आलीशान बंगले में
एक रिटायर्ड अफ़सर ने अपने ड्रॉइंग रूम में तिरंगे को सलाम किया।
शाम के लिए उसने दोस्तों के साथ स्कॉच की बोतल रख छोड़ी थी—
आज़ादी, संविधान और पुरानी यादों के नाम।
उसी वक्त, शहर के दूसरी तरफ़
एक चायवाले ने अपनी ठेली पर छोटा-सा तिरंगा लगाया।
उसने कहा,
“आज चाय ढाई-सौ बट नहीं, बस पचास पैसे कम मुनाफ़ा सही—
आज रिपब्लिक डे है।”
पास ही एक सरकारी स्कूल में
बच्चे फटे जूतों और चमकती आँखों के साथ
संविधान की प्रस्तावना बोल रहे थे—
“हम भारत के लोग…”
उनमें से किसी को नहीं पता था स्कॉच क्या होती है,
लेकिन उन्हें पता था
कि सब बराबर हैं।
दोपहर में परेड चल रही थी।
टीवी पर टैंक, झांकियाँ और साहस दिख रहा था।
एक अमीर कारोबारी,
एक ऑटो ड्राइवर,
एक छात्र और एक मज़दूर—
सब एक ही स्क्रीन देख रहे थे।
सबके हाथ में अलग-अलग चीज़ें थीं,
पर आँखों में एक ही भावना।
शाम ढलते-ढलते
उस अफ़सर ने स्कॉच का घूंट लिया
और कहा,
“ये संविधान ही है
जो मेरी आवा
YGSUJAN
ठीक है 😊
ये एक रिपब्लिक डे की कहानी है—जो स्कॉच के ग्लास से लेकर ढाई-सौ के नोट तक, हर किसी को छूती है।
26 जनवरी की सुबह थी।
दिल्ली की ठंड में सूरज धीरे-धीरे उठ रहा था।
लुटियंस ज़ोन के एक आलीशान बंगले में
एक रिटायर्ड अफ़सर ने अपने ड्रॉइंग रूम में तिरंगे को सलाम किया।
शाम के लिए उसने दोस्तों के साथ स्कॉच की बोतल रख छोड़ी थी—
आज़ादी, संविधान और पुरानी यादों के नाम।
उसी वक्त, शहर के दूसरी तरफ़
एक चायवाले ने अपनी ठेली पर छोटा-सा तिरंगा लगाया।
उसने कहा,
“आज चाय ढाई-सौ बट नहीं, बस पचास पैसे कम मुनाफ़ा सही—
आज रिपब्लिक डे है।”
पास ही एक सरकारी स्कूल में
बच्चे फटे जूतों और चमकती आँखों के साथ
संविधान की प्रस्तावना बोल रहे थे—
“हम भारत के लोग…”
उनमें से किसी को नहीं पता था स्कॉच क्या होती है,
लेकिन उन्हें पता था
कि सब बराबर हैं।
दोपहर में परेड चल रही थी।
टीवी पर टैंक, झांकियाँ और साहस दिख रहा था।
एक अमीर कारोबारी,
एक ऑटो ड्राइवर,
एक छात्र और एक मज़दूर—
सब एक ही स्क्रीन देख रहे थे।
सबके हाथ में अलग-अलग चीज़ें थीं,
पर आँखों में एक ही भावना।
शाम ढलते-ढलते
उस अफ़सर ने स्कॉच का घूंट लिया
और कहा,
“ये संविधान ही है
जो मेरी आवा
YGSUJAN
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